गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस के साथ छपने वाली पारंपरिक प्रश्नावली: 225 अक्षरों के कोष्ठक में छिपी नौ चौपाइयाँ। अपना प्रश्न मन में सोचें, श्री राम का स्मरण करें, और किसी एक कोष्ठक को छुएँ — उससे हर नौवाँ अक्षर मिलकर वह चौपाई बनाता है जो आपका उत्तर है।
फल (उत्तर): प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा, मनोकामना पूरी होगी।
बालकाण्ड — माता गौरी (पार्वती जी) सीता जी को आशीर्वाद देती हैं कि उनकी मनोकामना पूर्ण होगी।
फल (उत्तर): भगवान का स्मरण करके कार्य आरंभ करें — सफलता मिलेगी। प्रश्न उत्तम है।
सुन्दरकाण्ड — लंका में प्रवेश से पहले लंकिनी हनुमान जी से कहती है: श्री राम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश करो और सब कार्य करो।
फल (उत्तर): प्रश्न अच्छा नहीं। कार्य में छल-कपट है, अंत ठीक नहीं होगा — इसे छोड़ देना ही उचित है।
बालकाण्ड — जिसका भीतर और बाहर अलग हो, उसका अंत में निर्वाह नहीं होता — जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हुआ।
फल (उत्तर): प्रश्न मध्यम है। खोटे लोगों की संगति या धोखे की आशंका — सावधानी रखें, अपने गुण न छोड़ें।
बालकाण्ड — भाग्यवश सज्जन कुसंग में पड़ जाते हैं, पर सर्प की मणि की तरह अपने गुण नहीं छोड़ते।
फल (उत्तर): कार्य होना कठिन है / अभी अनिश्चित। इसे भगवान की इच्छा पर छोड़ दें, तर्क-वितर्क न करें — जो होगा, भले के लिए होगा।
बालकाण्ड — शिव जी पार्वती जी से कहते हैं: वही होगा जो राम ने रच रखा है, तर्क करके शाखाएँ क्यों बढ़ाना।
फल (उत्तर): प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा; सज्जनों के साथ और मार्गदर्शन से मंगल होगा।
बालकाण्ड — संतों का समाज आनंद और मंगल से भरा है, वह संसार में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है।
फल (उत्तर): प्रश्न बहुत उत्तम है। कार्य अवश्य सिद्ध होगा; संकट टलेगा और विरोधी भी अनुकूल होंगे।
सुन्दरकाण्ड — जिस पर श्री राम की कृपा हो, उसके लिए विष अमृत, शत्रु मित्र, समुद्र गाय का खुर और अग्नि शीतल हो जाती है।
फल (उत्तर): प्रश्न मध्यम है। कार्य में विघ्न और कठिन विरोध है; अभी सफलता में संदेह — धैर्य रखें, समय की प्रतीक्षा करें।
लंकाकाण्ड — मेघनाद के आगे वरुण, कुबेर, इंद्र, पवन जैसे देवता भी युद्ध में धैर्य नहीं रख सके।
फल (उत्तर): प्रश्न उत्तम है। मनोरथ सफल होगा, कार्य सिद्ध होगा।
बालकाण्ड — विश्वामित्र जी के साथ धनुष-यज्ञ देखने चलते समय: "तुम्हारे मनोरथ सफल हों" — सुनकर राम-लक्ष्मण प्रसन्न हुए।
चौपाइयाँ तुलसीदास जी की रामचरितमानस से हैं (गीता प्रेस संस्करण में यह प्रश्नावली छपी है)। उत्तर को चिंतन का मार्गदर्शन मानें, तय भविष्यवाणी नहीं।