
अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व: इस साल का विजय मुहूर्त, सामग्री, अपराजिता, शमी और शस्त्र पूजा की विधि, कथा और शाम का रावण दहन।
आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करें और दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें: अपना नाम, स्थान, तिथि (आश्विन शुक्ल दशमी) और यह कि आप परिवार की विजय, शांति और कल्याण के लिए विजयादशमी की पूजा कर रहे हैं।
फूल और अक्षत के साथ गणेश जी के स्मरण से आरंभ करें।
ईशान कोण में रोली या चावल के आटे से अष्टदल कमल बनाकर अपराजिता देवी (और दोनों ओर जया और विजया) की स्थापना करें। न बना सकें तो देवी का चित्र या कलश पर्याप्त है।
रोली, अक्षत, फूल, माला, धूप, दीप, नैवेद्य और पान चढ़ाकर नाम-मंत्र बोलें। फिर नीचे की प्रार्थना करें।
साफ़ किए हुए साधन, पुस्तकें, यंत्र या वाहन की चाबी देवी के सामने रखें। हल्दी-कुमकुम लगाएँ, थोड़ी मौली बाँधें, फूल चढ़ाएँ और इस भाव से प्रणाम करें कि ये साधन देवी ने सही कार्य करने के लिए दिए हैं।
जहाँ परिवार की परंपरा से शस्त्र पूजे जाते हैं, वहाँ सावधानी से, सुरक्षित और कानूनी तरीके से करें।
शमी वृक्ष के पास जाएँ (या घर पर पत्ते या चित्र रखें)। जल, रोली, अक्षत, फूल और दीप चढ़ाएँ, परिक्रमा करें और प्रार्थना करें। कई स्थानों पर कुछ पत्ते घर लाकर कीमती चीज़ों के साथ रखते हैं।
माँ दुर्गा को घी का दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। अपनी सुविधा से दुर्गा मंत्र, 108 नाम, दुर्गा चालीसा या छोटी स्तुति का पाठ करें।
आरती करें (आरती टैब देखें), भूल-चूक की क्षमा माँगें और प्रसाद बाँटें। बड़ों का आशीर्वाद लें और मित्रों-पड़ोसियों को पान या मिठाई दें।
रावण दहन सूर्यास्त के बाद शाम को (प्रदोष में) सार्वजनिक मैदानों में होता है। परिवार के साथ जाएँ, आग से सुरक्षित दूरी रखें और भीड़ का ध्यान रखें। स्थानीय परंपरा के अनुसार कुछ लोग अच्छाई की जीत के प्रतीक रूप में थोड़ी राख या पुतले का टुकड़ा लाते हैं।
अबूझ मुहूर्त: विजयादशमी साल के "साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों" में गिनी जाती है, इसलिए कई लोग आज नया काम शुरू करते हैं: दुकान, वाहन, व्यापार, विद्यारंभ या नया खाता। यह श्रद्धा की परंपरा है, कोई नियम नहीं।
नीलकंठ दर्शन: कई क्षेत्रों में इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।
सोना पत्ता: महाराष्ट्र आदि में आपटा के पत्ते "सोना" कहकर बड़ों और मित्रों को दिए जाते हैं, समृद्धि की शुभकामना के साथ।
अलग-अलग परंपराएँ: बंगाल में दुर्गा विसर्जन और सिंदूर खेला, दक्षिण में आयुध पूजा और विद्यारंभ, उत्तर में रामलीला और रावण दहन, और मैसूर में शाही शोभायात्रा होती है। अपने परिवार और क्षेत्र की परंपरा का पालन करें।
मंत्र पूजा-पुस्तकों के परंपरागत मंत्र हैं। एक बार अपनी पुस्तक से मिला लें और अपने परिवार की परंपरा का पालन करें।
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग कृपाण धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥
शुम्भ निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
चौंसठ योगिनी मंगल, गावत नृत्य करत।
भैरव तुम अंग राखत, तव आज्ञा करत॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरतारी।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपत्ति कारी॥
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
विजयादशमी उस दिन मनाई जाती है जब अपराह्न काल (दिन के पाँच भागों में से चौथा) में दशमी तिथि हो। विजय मुहूर्त दिन के 15 मुहूर्तों में से 11वाँ है। समय नई दिल्ली के लिए हैं; दूसरे शहरों में कुछ मिनट से लेकर लगभग आधे घंटे तक का अंतर होता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें।
इस दिन के बारे में चार कथाएँ कही जाती हैं; हर क्षेत्र एक या अधिक को याद करता है।
सीता जी के लिए हुए लंबे युद्ध के बाद इसी दिन श्री राम ने रावण को पराजित किया। कई परंपराओं में श्री राम ने अंतिम युद्ध से पहले माँ दुर्गा की पूजा की और उनका आशीर्वाद पाया। इसीलिए यह दिन अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में रामलीला और रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के दहन के साथ मनाया जाता है।
नौ दिन के युद्ध के बाद माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया, इसलिए इस दिन को विजयादशमी भी कहते हैं: अहंकार और बुराई पर शक्ति की जीत। यह नवरात्रि का समापन है।
पांडवों ने अज्ञातवास में अपने शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे और कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले विजयादशमी पर उन्हें वापस लिया। इसीलिए इस दिन शमी वृक्ष और शस्त्रों की पूजा होती है।
एक क्षेत्रीय कथा के अनुसार गुरुदक्षिणा के लिए सोना चाहिए था तो कौत्स राजा रघु के पास गए; तब कुबेर ने शमी और आपटा के पेड़ों पर स्वर्ण-मुद्राओं की वर्षा की, और तभी से आज के दिन इन पत्तों को "सोना" कहकर दिया जाता है।
क्षेत्र और परिवार के अनुसार परंपरा अलग होती है। अपनी परंपरा और पंडित जी की सलाह के अनुसार करें; जो वस्तु काम न आए उसे छोड़ सकते हैं।
विजयादशमी आश्विन शुक्ल दशमी को पड़ती है, नवरात्रि के बाद। 2026 में यह 20 अक्टूबर, मंगलवार को है। इस साल का विजय मुहूर्त और अपराह्न काल इसी पेज के मुहूर्त टैब में है।
दिन के समय को 15 बराबर मुहूर्तों में बाँटने पर 11वाँ मुहूर्त विजय मुहूर्त कहलाता है। यह अपराह्न काल के भीतर आता है और इसी में विजयादशमी की पूजा, शमी पूजा और नया काम शुरू करना शुभ माना जाता है।
परंपरा के अनुसार विजयादशमी की पूजा अपराह्न काल (दोपहर बाद) में, जब दशमी तिथि हो, की जाती है। सुबह दुर्गा पूजा या हवन किया जा सकता है, पर शमी पूजा, अपराजिता पूजा और शस्त्र पूजा अपराह्न में करना श्रेष्ठ माना गया है।
रावण दहन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में किया जाता है। यह आयोजकों द्वारा तय होता है, इसलिए अपने शहर की रामलीला समिति से समय पूछ लें।
पांडवों ने अपने शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे और विजयादशमी पर वहीं से लेकर युद्ध में विजय पाई। श्री राम ने भी शमी का पूजन किया माना जाता है। इसलिए विजय और पाप-शमन के लिए इस दिन शमी की पूजा की जाती है।
शमी का चित्र या गमले का पौधा रखकर पूजा कर सकते हैं। महाराष्ट्र आदि में आपटा के पत्तों से भी यही पूजा की जाती है। भाव और श्रद्धा मुख्य हैं।
हाँ, इसे साल के साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में गिना जाता है, इसलिए वाहन, दुकान, व्यापार या विद्यारंभ जैसे काम शुरू करना शुभ माना जाता है। यह श्रद्धा की परंपरा है; इसके लिए अलग मुहूर्त देखना ज़रूरी नहीं माना गया है।