
शिव पूजा और शिवलिंग अभिषेक के लिए सब कुछ एक जगह — महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष या नित्य पूजा के लिए: सामग्री की चेकलिस्ट, क्रम से पूजा विधि, शिवरात्रि की चार प्रहर पूजा और आरती।
फूल से अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कते हुए मंत्र बोलें; फिर तीन बार आचमन करें।
हर पूजा गणेश जी से शुरू होती है: गणेश जी को (या ईशान कोण में) मंत्र के साथ फूल और अक्षत अर्पित करें।
दाएँ हाथ में जल, अक्षत और फूल लें; अपना नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और मनोकामना (आरोग्य, शांति, भय-निवारण, जो व्रत रख रहे हों) बोलें — फिर जल छोड़ दें।
हाथ जोड़कर भगवान शिव का ध्यान करें — हिमालय में विराजमान, मस्तक पर चंद्रमा, जटा में गंगा, गले में सर्प, त्रिशूल और डमरू — और फूल अर्पित करें।
लोटे से शिवलिंग पर पतली, अटूट धार में जल चढ़ाएँ, पूरे समय "ॐ नमः शिवाय" बोलते रहें। धीरे-धीरे, ऊपर से, धार लिंग पर गिरे।
एक-एक करके चढ़ाएँ: दूध, दही, घी, शहद, चीनी/गन्ने का रस — हर एक के बीच थोड़ा जल — फिर मिला हुआ पंचामृत, फिर केसर/गुलाब जल हो तो, और अंत में फिर शुद्ध जल।
शास्त्र में हर द्रव्य का फल है: दूध — आरोग्य, दही — संतान, घी — बल, शहद — मधुर वाणी, चीनी — समृद्धि। इकट्ठा हुआ जल प्रसाद है: एक बूँद सिर पर लगाएँ, बाकी पौधों में।
शिवलिंग को साफ़ कपड़े से पोंछें। वस्त्र और जनेऊ अर्पित करें, फिर अनामिका से सफ़ेद चंदन का त्रिपुंड (तीन रेखाएँ), भस्म और अक्षत। शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम, सिंदूर नहीं लगाते — ये माँ पार्वती के लिए हैं।
बिल्व मंत्र के साथ बिल्व पत्र एक-एक करके शिवलिंग के ऊपर चढ़ाएँ, फिर धतूरा, भांग, आक के फूल, सफ़ेद फूल और माला।
धूप और दीप दिखाएँ। फल, मिश्री, खीर/ठंडाई और नारियल का भोग लगाएँ, थाली के चारों ओर जल घुमाएँ, फिर पान-सुपारी और आचमन के लिए जल अर्पित करें।
रुद्राक्ष की माला पर "ॐ नमः शिवाय" का 108 बार जाप करें, या महामृत्युंजय मंत्र (11 / 108) — या शिव चालीसा, रुद्राष्टकम् या शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें।
घी के दीपक या कपूर से "ॐ जय शिव ओंकारा" गाते हुए आरती करें — बोल आरती टैब में हैं।
शिवलिंग की आधी ही परिक्रमा करें — घड़ी की दिशा में जलाधारी की नाली तक जाएँ, उसे लाँघें नहीं, उसी रास्ते लौटें (नाली से अभिषेक का जल बहता है, जिसे लाँघते नहीं)। फिर पुष्पांजलि मंत्र के साथ फूल/अक्षत अर्पित कर प्रणाम करें।
पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें और प्रसाद बाँटें। शिवलिंग पर चढ़े बिल्व पत्र ताज़े न मिलें तो धोकर अगले दिन फिर चढ़ाए जा सकते हैं।
शिवलिंग पर नहीं चढ़ता: तुलसी, केतकी (केवड़ा) के फूल, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, और शंख से जल। कटे-फटे बिल्व पत्र न चढ़ाएँ।
बिल्व पत्र: सबसे प्रिय अर्पण: तीन पत्तियों वाला, चिकनी सतह नीचे। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति और सोमवार को नहीं तोड़ते — एक दिन पहले तोड़ लें।
आधी परिक्रमा: शिवलिंग की आधी ही परिक्रमा होती है — जलाधारी की नाली नहीं लाँघी जाती।
शिव के दिन: सोमवार, हर पक्ष का प्रदोष (त्रयोदशी की शाम), मासिक शिवरात्रि (कृष्ण चतुर्दशी), पूरा सावन महीना, और महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी)।
यह आम घरेलू पूजा विधि है; क्रम और कुछ मंत्र क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं (रुद्री पाठ के साथ रुद्राभिषेक पंडित जी कराते हैं)। मंत्र पारंपरिक रूप में दिए गए हैं — इन्हें एक बार किसी विश्वसनीय पुस्तक (जैसे गीता प्रेस) या पारिवारिक पंडित जी से मिला लेना अच्छा है।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जग संहारकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठि दर्शन पावत महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुण स्वामी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥
महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (फरवरी/मार्च) को होती है। पूजा रात में चार प्रहरों में होती है, मुख्य पूजा निशीथ काल (लगभग मध्यरात्रि) में।
| प्रहर | समय (लगभग, नई दिल्ली) | अभिषेक व मंत्र |
| 1 | सूर्यास्त से (~6 – 9 बजे रात) | दूध से अभिषेक; बिल्व; मंत्र "ॐ ह्रीं ईशानाय नमः" |
| 2 | ~9 – 12 बजे रात | दही से अभिषेक; बिल्व; "ॐ ह्रीं अघोराय नमः" |
| 3 | ~12 – 3 बजे रात (निशीथ काल इसी प्रहर में — मुख्य पूजा) | घी से अभिषेक; बिल्व; "ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः" |
| 4 | ~3 बजे – सूर्योदय | शहद से अभिषेक; बिल्व; "ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः" |
प्रहर का समय रात (सूर्यास्त से सूर्योदय) को चार भागों में बाँटकर है; उस तारीख का सही सूर्यास्त और सूर्योदय संपूर्ण पंचांग पेज पर देखें।
तारीखें नई दिल्ली की हैं और कुछ क्षेत्रों या पंचांगों में एक दिन का अंतर हो सकता है।
यह आम तौर पर प्रयुक्त सूची है; सामग्री क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है — जहाँ अंतर हो, अपनी परंपरा मानें। नित्य अभिषेक के लिए जल, बिल्व और दीपक पर्याप्त हैं।