
दिवाली की लक्ष्मी-गणेश पूजा के लिए सब कुछ एक जगह: सामग्री की चेकलिस्ट, क्रम से पूजा विधि, दिवाली के पाँच दिन और आरती।
फूल से अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कते हुए मंत्र बोलें; फिर तीन बार आचमन करें।
देवताओं के दाईं ओर बड़ा घी का दीपक जलाएँ; यह पूरी पूजा में जलता रहे (कई लोग इसे रात भर जलाए रखते हैं)।
दाएँ हाथ में जल, अक्षत, फूल और सिक्का लें; तिथि, स्थान, अपना नाम-गोत्र और उद्देश्य ("माँ लक्ष्मी की कृपा, परिवार की समृद्धि और कल्याण के लिए") बोलें, फिर जल छोड़ दें।
गणेश जी की मूर्ति को जल से स्नान कराएँ (तस्वीर हो तो छींटे दें), रोली-हल्दी का तिलक और अक्षत लगाएँ, दूर्वा, फूल और मोदक या लड्डू चढ़ाएँ। निर्विघ्न पूजा की प्रार्थना करें।
कलश में जल भरें, सिक्का, सुपारी और अक्षत डालें, ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखें, मौली बाँधें और रोली से स्वस्तिक बनाएँ। उस पर रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
हाथ जोड़कर माँ लक्ष्मी का ध्यान करें — कमल पर विराजमान, स्वर्ण वर्ण, धन की वर्षा करती हुईं, दोनों ओर गज। फिर अक्षत और फूल लेकर उन्हें मूर्ति में पधारने का आवाहन करें।
हर वस्तु क्रम से चढ़ाएँ, और बोलें "ॐ महालक्ष्म्यै नमः, [उपचार] समर्पयामि":
आसन → पाद्य → अर्घ्य → आचमन → स्नान (पंचामृत, फिर जल) → वस्त्र (चुनरी) → आभूषण (गहने/सिक्के) → गंध (चंदन, रोली, हल्दी) → अक्षत → पुष्प (कमल, लाल फूल, माला) → धूप → दीप → नैवेद्य (खील-बताशे, मिठाई, फल; फिर जल) → ताम्बूल → दक्षिणा → प्रदक्षिणा और नमस्कार
तिजोरी / लॉकर की चाबियाँ, सिक्के और गहने माँ के सामने चावल की ढेरी पर रखें; तिलक-अक्षत लगाएँ और धन के रक्षक कुबेर से प्रार्थना करें।
दुकानदार और व्यापारी: नए बही-खाते पर रोली से स्वस्तिक और "शुभ लाभ" लिखें, अक्षत और फूल चढ़ाएँ, और माँ के आशीर्वाद से नए वर्ष का हिसाब शुरू करें।
हो सके तो श्री सूक्त या लक्ष्मी चालीसा / अष्टोत्तर शतनामावली (108 नाम) का पाठ करें; नहीं तो माला पर लक्ष्मी मंत्र 108 बार जपें।
पहले गणेश जी की, फिर माँ लक्ष्मी की आरती करें — "आरती" टैब देखें।
मुख्य पूजा-दीपक से दीये जलाकर द्वार, हर कमरे, रसोई, जल-स्थान, तुलसी और छत पर रखें — कोई कोना अंधेरा न रहे। माँ लक्ष्मी के आगमन के लिए एक दीया दहलीज़ पर रखें।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई किसी भूल के लिए माँ से क्षमा माँगें।
खील-बताशे और मिठाई प्रसाद रूप में बाँटें। पूजा के सिक्के/गहने अगली सुबह तिजोरी में रखें — वे वर्ष भर के लिए आशीर्वादित माने जाते हैं।
यह दिवाली की आम घरेलू पूजा विधि है; क्रम और कुछ मंत्र क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं। मंत्र पारंपरिक रूप में दिए गए हैं — इन्हें एक बार किसी विश्वसनीय पुस्तक (जैसे गीता प्रेस) या पारिवारिक पंडित जी से मिला लेना अच्छा है।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख-संपत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
जिस घर में तुम रहतीं, तहँ सब सद्गुण आता।
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे ही आता॥
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
धूप-दीप-पुष्प चढ़ाकर, भक्त आरती गाते।
मनवांछित फल पाते, दुख-दरिद्र मिटाते॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता। 🙏
दिवाली पाँच दिनों का पर्व है: धनतेरस से भाई दूज तक। लक्ष्मी पूजा तीसरे दिन, अमावस्या को होती है।
कोई नई वस्तु (बर्तन, सोना/चांदी) खरीदें और शाम को दहलीज़ पर यमराज के लिए दीया जलाएँ। भगवान धन्वंतरि की पूजा भी होती है।
सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान (तेल मालिश); शाम को दीये। कई घरों में हनुमान जी की पूजा भी होती है।
मुख्य दिन: शाम को (प्रदोष काल, हो सके तो वृषभ के स्थिर लग्न में) लक्ष्मी-गणेश पूजा — इसी पेज की विधि। पूरे घर में दीये।
गोबर से बने गोवर्धन की पूजा; श्री कृष्ण को अनेक व्यंजनों का अन्नकूट भोग।
बहनें भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु की कामना करती हैं; भाई उपहार देते हैं।
पूजा शाम को प्रदोष काल में (सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक) और परंपरा से स्थिर लग्न में — वृषभ लग्न, जो दिवाली की शाम उदय होता है — की जाती है, ताकि माँ लक्ष्मी "स्थिर" रहें। उस दिन का सही समय जानने के लिए उस तारीख का संपूर्ण पंचांग खोलें: सूर्यास्त देखें, और राहु काल से बचें।
तारीखें नई दिल्ली (सूर्योदय / प्रदोष आधारित) की हैं और कुछ क्षेत्रों या पंचांगों में एक दिन का अंतर हो सकता है।
यह आम तौर पर प्रयुक्त सूची है; सामग्री क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है — जहाँ अंतर हो, अपनी परंपरा मानें।