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श्री गणेश

श्री गणेश पूजा

ॐ गं गणपतये नमः

गणेश पूजा के लिए सब कुछ एक जगह — गणेश चतुर्थी (स्थापना से विसर्जन तक) और नित्य या संकष्टी पूजा के लिए: सामग्री की चेकलिस्ट, क्रम से पूजा विधि, गणेशोत्सव के दिन और आरती।

पूजा से पहले

  • स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें (गणेश पूजा में लाल या पीला रंग शुभ माना जाता है)। पूजा स्थान और घर साफ़ करें।
  • चौकी इस तरह रखें कि आप पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। कपड़ा बिछाएँ, बीच में मूर्ति और (आपके देखने से) दाईं ओर कलश रखें।
  • गणेश चतुर्थी पर मूर्ति को मुहूर्त से पहले सिर पर कपड़ा ढककर घर लाएँ; स्थापना के समय ही खोलें। स्थापना मध्याह्न मुहूर्त में होती है — समय पंचांग में देखें।
  • दूर्वा की जोड़ियाँ, सिंदूर और मोदक तैयार रखें — ये तीनों गणेश जी के विशेष अर्पण हैं।

पूजा विधि — क्रम से

  1. 1पवित्रीकरण और आचमन

    फूल से अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कते हुए मंत्र बोलें; फिर तीन बार आचमन करें।

    मंत्र
    ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
    यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
  2. 2दीप प्रज्वलन

    मूर्ति की दाईं ओर घी का दीपक और धूप/अगरबत्ती जलाएँ; दीपक पूरी पूजा में जलता रहे।

    मंत्र
    ॐ दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
    दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
  3. 3संकल्प

    दाएँ हाथ में जल, अक्षत, फूल और सिक्का लें; अपना नाम, गोत्र, स्थान और तिथि बोलकर मनोकामना कहें (जैसे विघ्न-निवारण, नए कार्य में सफलता) — फिर जल थाली में छोड़ दें।

    मंत्र
    मम सकलविघ्ननिवृत्तिपूर्वकं सर्वकार्यसिद्ध्यर्थं
    श्रीगणपतिपूजनं करिष्ये।
  4. 4स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा (गणेश चतुर्थी पर)

    चौकी पर अक्षत की ढेरी बनाकर उस पर मूर्ति रखें। फूल (या दाएँ हाथ) से मूर्ति के हृदय को स्पर्श करते हुए प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र से गणेश जी का आवाहन करें।

    रोज़ की पूजा में स्थिर मूर्ति/तस्वीर हो तो यह चरण केवल हाथ जोड़कर आवाहन है।

    मंत्र
    ॐ गं गणपतये नमः। आवाहयामि स्थापयामि।
    अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च।
    अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥
  5. 5कलश स्थापना

    कलश में जल भरें, सिक्का, सुपारी और अक्षत डालें, गले में मौली बाँधें, आम के पत्ते लगाकर ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें। वरुण देव और पवित्र नदियों का आवाहन करें।

    मंत्र
    गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
    नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
  6. 6ध्यान और आवाहन

    हाथ जोड़कर गणेश जी का ध्यान करें और ध्यान श्लोक के साथ फूल अर्पित करें।

    मंत्र
    वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
    निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
  7. 7स्नान और अभिषेक

    धातु की मूर्ति हो तो जल, फिर पंचामृत, फिर जल से स्नान कराकर साफ़ कपड़े से पोंछें। मिट्टी की मूर्ति को स्नान नहीं कराते — फूल से जल की कुछ बूँदें छिड़कें।

    मंत्र
    ॐ गं गणपतये नमः। स्नानं समर्पयामि।
  8. 8षोडशोपचार — वस्त्र, तिलक, दूर्वा, पुष्प

    वस्त्र और जनेऊ अर्पित करें, फिर चंदन और सिंदूर का तिलक, अक्षत, माला और लाल फूल चढ़ाएँ।

    दूर्वा की 21 जोड़ियाँ एक-एक करके चरणों में चढ़ाएँ, हर बार गणेश जी का एक नाम लेते हुए — या सबके साथ नीचे का दूर्वा मंत्र बोलें।

    धूप और दीप दिखाएँ, फिर पान-सुपारी, लौंग और इलायची अर्पित करें।

    मंत्र
    ॐ गं गणपतये नमः। दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि।
    ॐ सुमुखाय नमः। ॐ एकदन्ताय नमः। ॐ कपिलाय नमः। ॐ गजकर्णकाय नमः।
    ॐ लम्बोदराय नमः। ॐ विकटाय नमः। ॐ विघ्ननाशाय नमः। ॐ विनायकाय नमः।
    ॐ धूम्रकेतवे नमः। ॐ गणाध्यक्षाय नमः। ॐ भालचन्द्राय नमः। ॐ गजाननाय नमः।
  9. 9नैवेद्य (भोग)

    मोदक, लड्डू, फल और नारियल का भोग लगाएँ, थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाएँ। फिर आचमन के लिए जल अर्पित करें।

    मंत्र
    ॐ गं गणपतये नमः। नैवेद्यं निवेदयामि।
    ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा।
    ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा।
  10. 10मंत्र जाप / पाठ

    गणेश मूल मंत्र का 108 (या 11 / 21) बार जाप करें, या गणेश अथर्वशीर्ष / संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें।

    मंत्र
    ॐ गं गणपतये नमः।
    ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
  11. 11आरती

    घी के दीपक या कपूर से "जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा" गाते हुए आरती करें — बोल आरती टैब में हैं।

  12. 12प्रदक्षिणा और पुष्पांजलि

    चौकी की (या अपने स्थान पर) तीन परिक्रमा करें, फिर पुष्पांजलि मंत्र के साथ फूल/अक्षत अर्पित कर प्रणाम करें।

    मंत्र
    यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
    तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥
  13. 13क्षमा प्रार्थना और प्रसाद

    पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें, फिर प्रसाद बाँटें। गणेश चतुर्थी पर जितने दिन मूर्ति रहे, सुबह-शाम आरती करें; विसर्जन के लिए गणेशोत्सव टैब देखें।

    मंत्र
    आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
    पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥

गणेश पूजा की विशेष बातें

दूर्वा: 3 या 5 पत्तियों की जोड़ी में 21 दूर्वा चढ़ाएँ — गणेश जी का सबसे प्रिय अर्पण।

तुलसी नहीं चढ़ती: गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती (कुछ परंपराओं में केवल गणेश चतुर्थी को अपवाद); केतकी के फूल भी नहीं।

सिंदूर और मोदक: गणेश जी को सिंदूर (केवल चंदन नहीं) और भोग में मोदक / लड्डू चढ़ाए जाते हैं।

सबसे पहले गणेश: हर पूजा में सबसे पहले गणेश जी पूजे जाते हैं — इसलिए यह विधि किसी भी पूजा का आरंभ भी है।

यह आम घरेलू पूजा विधि है; क्रम और कुछ मंत्र क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं। मंत्र पारंपरिक रूप में दिए गए हैं — इन्हें एक बार किसी विश्वसनीय पुस्तक (जैसे गीता प्रेस) या पारिवारिक पंडित जी से मिला लेना अच्छा है।

आरती कैसे करें

  1. आरती की थाली सजाएँ: घी का दीपक या कपूर, रोली, अक्षत, फूल और घंटी।
  2. बाएँ हाथ से घंटी बजाएँ और दाएँ हाथ से थाली घड़ी की दिशा में घुमाते हुए गाएँ।
  3. प्रचलित तरीक़ा: चार बार चरणों में, दो बार नाभि के पास, एक बार मुख के सामने, फिर सात बार पूरे स्वरूप पर।
  4. आरती के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाएँ और सबको आरती दें।

आरती — जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतवारी।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

गणेशोत्सव गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) से अनंत चतुर्दशी तक — दस दिन। परिवार मूर्ति डेढ़, 5, 7 या पूरे 10 दिन रखते हैं।

इस साल की गणेश चतुर्थी की तारीखें देखी जा रही हैं…
  1. 1गणेश चतुर्थी — स्थापना

    मूर्ति घर लाकर मध्याह्न मुहूर्त में स्थापना करें (इसी पेज की विधि)। परंपरा से इस रात चंद्रमा नहीं देखा जाता।

  2. 2डेढ़ दिन का विसर्जन

    कई परिवार डेढ़ दिन मूर्ति रखकर दूसरे दिन दोपहर की आरती के बाद विसर्जन करते हैं।

  3. 3पाँचवें दिन का विसर्जन

    एक और प्रचलित विकल्प — पाँचवें दिन गणपति की विदाई।

  4. 4सातवें दिन का विसर्जन

    कुछ परिवार और मंडल सातवें दिन विसर्जन करते हैं।

  5. 5अनंत चतुर्दशी — अंतिम विसर्जन

    दसवाँ दिन: उत्तर-पूजा और आरती, फिर "गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" के साथ मूर्ति का जल में विसर्जन। मिट्टी की मूर्ति और पर्यावरण-अनुकूल (टब / कृत्रिम तालाब) विसर्जन चुनें।

स्थापना मुहूर्त

स्थापना मध्याह्न काल में होती है — सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच का लगभग मध्य भाग, जब गणेश जी का जन्म माना जाता है। उस दिन का सही समय जानने के लिए उस तारीख का संपूर्ण पंचांग खोलें (सूर्योदय/सूर्यास्त और अभिजित मुहूर्त) और राहु काल से बचें।

विसर्जन — कैसे करें

  1. अंतिम आरती करें; मोदक/लड्डू और थोड़ा दही-चावल "यात्रा के भोजन" के रूप में अर्पित करें।
  2. हाथ में अक्षत लेकर चौकी पर मूर्ति को थोड़ा सा हिलाएँ (उत्तर-पूजा) — यह विदाई का संकेत है, फिर मुख खुला रखकर आदर से ले जाएँ।
  3. बहते जल या साफ़ टब में धीरे से विसर्जित करें; घर के विसर्जन का जल पौधों/बगीचे में डालें। पत्ते-फूल जल में नहीं, अलग डिब्बे में डालें।

गणेशोत्सव के अलावा हर महीने संकष्टी चतुर्थी (कृष्ण पक्ष चतुर्थी, व्रत चंद्रोदय के बाद खुलता है) और विनायक चतुर्थी (शुक्ल पक्ष, मध्याह्न पूजा) को गणेश जी की पूजा होती है। सप्ताह में बुधवार गणेश जी का दिन है।

तारीखें नई दिल्ली की हैं और कुछ क्षेत्रों या पंचांगों में एक दिन का अंतर हो सकता है।

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पूजा सामग्री सूची

मूर्ति व आसन (0/5)

कलश (0/5)

पूजा की सामग्री (0/20)

वस्त्र व शृंगार (0/5)

भोग व प्रसाद (0/6)

विसर्जन के लिए (गणेश चतुर्थी) (0/3)

यह आम तौर पर प्रयुक्त सूची है; सामग्री क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है — जहाँ अंतर हो, अपनी परंपरा मानें। नित्य पूजा के लिए केवल पूजा सामग्री और भोग पर्याप्त हैं।