
माँ दुर्गा की पूजा और नवरात्रि के लिए ज़रूरी सारा सामान एक सूची में। जैसे-जैसे सामान जुटाएँ, टिक करते जाएँ — आपकी सूची इसी डिवाइस पर सहेजी रहती है।
बाएँ हाथ में थोड़ा जल लें, दाएँ हाथ से फूल या कुश उसमें डुबोकर अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर छिड़कें, और यह मंत्र बोलें:
दाएँ हाथ की हथेली से तीन बार जल पिएँ, हर बार एक नाम के साथ, फिर चौथे नाम से हाथ धो लें:
अपने आसन पर जल की कुछ बूँदें छिड़कें और पृथ्वी माता से प्रार्थना करें:
माँ के दाईं ओर घी का दीपक जलाएँ (नवरात्रि में अखंड ज्योति रखते हों तो वही), और उस पर एक फूल चढ़ाएँ:
दाएँ हाथ में जल, अक्षत, फूल और सिक्का लें। तिथि, स्थान, अपना नाम और गोत्र, और पूजा का उद्देश्य बोलें (अपने शब्दों में भी बोल सकते हैं), फिर जल माँ के सामने छोड़ दें।
खाली जगहों पर मास, पक्ष, तिथि, अपना गोत्र और नाम बोलें (आज का पंचांग इसी साइट पर देखें)।
हर पूजा श्री गणेश से शुरू होती है। गणेश जी (मूर्ति, तस्वीर, या मौली बँधी सुपारी उनके प्रतीक के रूप में) को रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएँ:
नवरात्रि में यह पहले दिन (प्रतिपदा) शुभ मुहूर्त में होता है — पंचांग देखें।
मिट्टी के चौड़े पात्र में मिट्टी बिछाएँ, उसमें जौ बोएँ और जल छिड़कें।
कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और गले में मौली बाँधें। उसमें जल और थोड़ा गंगाजल भरें; सिक्का, सुपारी, अक्षत और दूर्वा डालें।
कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते लगाएँ, चावल भरा ढक्कन रखें, और उस पर लाल कपड़े में लिपटा (मौली बँधा) नारियल रखें। कलश को जौ वाले पात्र पर या माँ के पास स्थापित करें।
कलश पर रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ और वरुण देव का आवाहन करें:
हाथ जोड़ें, आँखें बंद करें, और माँ दुर्गा के स्वरूप का ध्यान करें — सिंह पर विराजमान, अस्त्र धारण किए, भक्तों को आशीर्वाद देती हुई:
जुड़े हाथों में अक्षत और फूल लेकर माँ को मूर्ति/तस्वीर में पधारने का निमंत्रण दें, और उनके चरणों में अर्पित करें:
नीचे की हर वस्तु क्रम से चढ़ाएँ, और हर बार "ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः, [उपचार] समर्पयामि" बोलें:
आसन (आसन के रूप में फूल) → पाद्य (चरणों में जल) → अर्घ्य (रोली, अक्षत, फूल मिला जल) → आचमन (जल) → स्नान (पंचामृत, फिर शुद्ध जल; तस्वीर हो तो फूल से छींटें दें)
वस्त्र (लाल चुनरी) → श्रृंगार (चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, आलता, कंघी, शीशा…) → गंध (चंदन और रोली, फिर सिंदूर) → अक्षत → पुष्प और माला (लाल फूल)
धूप → दीप → नैवेद्य (भोग — फल, मिठाई; फिर जल अर्पित करें) → ताम्बूल (पान पर सुपारी, लौंग, इलायची) → दक्षिणा (सिक्का) → प्रदक्षिणा और नमस्कार
श्रद्धा से दुर्गा सप्तशती का पाठ करें (समय कम हो तो दुर्गा चालीसा या अर्गला-कवच-कीलक)।
माला पर माँ का मंत्र जपें — एक माला 108 बार। कई घरों में नीचे दिया छोटा मंत्र जपा जाता है; नवार्ण मंत्र परंपरा से गुरु से लिया जाता है।
घी के दीपक या कपूर से माँ की आरती करें — विधि "आरती" टैब में देखें।
जुड़े हाथों में फूल लेकर माँ को अर्पित करें, और पूजा स्थान की परिक्रमा करें (या अपनी जगह पर ही घूमकर) हाथ जोड़े रहें:
हाथ जोड़कर माँ से पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें:
भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें, फिर स्वयं ग्रहण करें।
अखंड ज्योति: घटस्थापना पर अखंड ज्योति जलाएँ तो उसे नौ दिन लगातार जलने दें — घी डालते रहें और बत्ती सावधानी से ठीक करें, और ज्योति जलती छोड़कर घर खाली न छोड़ें।
रोज़ की पूजा: कलश स्थापना एक बार, प्रतिपदा को होती है। अगले दिनों में बाक़ी विधि (ध्यान से आगे) सुबह-शाम करें, और रोज़ जौ में थोड़ा जल डालें।
कन्या पूजन (अष्टमी / नवमी): नौ छोटी कन्याओं (प्रायः 2–10 वर्ष) को और परंपरा के अनुसार एक बालक को लांगुर/भैरव के रूप में आमंत्रित करें। उनके पैर धोएँ, तिलक लगाएँ, मौली बाँधें, हलवा-पूरी-चना खिलाएँ, उपहार या दक्षिणा दें, और पैर छूकर आशीर्वाद लें।
विसर्जन (दशमी): अंतिम पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना के साथ माँ से विदा लें, कलश को आदर से हटाएँ, और जवारे बहते जल में विसर्जित करें या सम्मान से रखें — कई लोग कुछ जवारे आशीर्वाद के रूप में रख लेते हैं।
यह आम घरेलू पूजा विधि है। क्रम और कुछ मंत्र क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं; मंत्र पारंपरिक रूप में दिए गए हैं, और इन्हें एक बार किसी विश्वसनीय पुस्तक (जैसे गीता प्रेस) या अपने पारिवारिक पंडित जी से मिला लेना अच्छा है। सच्चे मन से की गई पूजा हर चरण के बिना भी पूर्ण मानी जाती है।
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग कृपाण धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥
शुम्भ निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
चौंसठ योगिनी मंगल, गावत नृत्य करत।
भैरव तुम अंग राखत, तव आज्ञा करत॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरतारी।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपत्ति कारी॥
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) की, हर दिन एक रूप की, पूजा होती है। हर दिन का अपना स्वरूप, मंत्र, भोग और — लोकप्रिय परंपरा के अनुसार — पहनने का रंग है।
स्वरूप: वृषभ (नंदी) पर सवार; दाएँ हाथ में त्रिशूल, बाएँ में कमल। मस्तक पर अर्धचंद्र।
भोग: शुद्ध घी (या घी से बना पदार्थ) · फल: आरोग्य, बल और स्थिरता; मूलाधार चक्र
स्वरूप: पैदल चलती हुईं; दाएँ हाथ में जप माला, बाएँ में कमंडल। श्वेत वस्त्र।
भोग: शक्कर और फल (या पंचामृत) · फल: भक्ति, धैर्य और साधना-विद्या में सफलता; दीर्घायु
स्वरूप: सिंह पर सवार; दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र, युद्ध के लिए तत्पर; स्वर्ण वर्ण; मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र।
भोग: दूध और दूध से बनी मिठाई (खीर) · फल: साहस और निर्भयता; घर में शांति
स्वरूप: सिंह पर सवार; आठ भुजाओं (अष्टभुजा) में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला।
भोग: मालपुआ · फल: आरोग्य, यश और समृद्धि; दुःख का नाश
स्वरूप: कमल पर विराजमान, गोद में बालक स्कंद; चार भुजाएँ — दो में कमल, एक में स्कंद, एक वरद मुद्रा में।
भोग: केला · फल: संतान और परिवार का सुख; ज्ञान
स्वरूप: सिंह पर सवार; चार भुजाएँ — बाएँ हाथों में खड्ग और कमल, दाएँ हाथ वर और अभय मुद्रा में।
भोग: शहद · फल: विवाह और उत्तम जीवनसाथी; बाधाओं का नाश
स्वरूप: गर्दभ (गधे) पर सवार; श्याम वर्ण, बिखरे केश, अग्निमय श्वास; बाएँ हाथों में खड्ग और लौह कांटा, दाएँ हाथ वर और अभय मुद्रा में। रूप भयंकर, पर भक्तों के लिए सदा शुभ — इसलिए "शुभंकरी" भी।
भोग: गुड़ · फल: भय, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
स्वरूप: वृषभ पर सवार; गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र और आभूषण; चार भुजाएँ — त्रिशूल और डमरू, शेष हाथ वर और अभय मुद्रा में।
भोग: नारियल · फल: पवित्रता, शांति और मनोकामना पूर्ति; इसी दिन (अष्टमी) प्रायः कन्या पूजन होता है
स्वरूप: कमल पर विराजमान (सिंह पर भी दर्शाई जाती हैं); चार भुजाओं में चक्र, गदा, शंख और कमल। देव, ऋषि और सिद्ध सभी इनकी उपासना करते हैं।
भोग: तिल और हलवा-पूरी-चना · फल: सभी सिद्धियाँ, ज्ञान और व्रत की पूर्णता; नवमी को कन्या पूजन
नौ रूप, उनके मंत्र (देवी कवच से) और भोग पारंपरिक हैं। दिन का रंग आधुनिक परंपरा है जो वार के अनुसार चलती है: यह सूची प्रचलित पंचांग तालिकाओं से मिलती है। तारीखें नई दिल्ली (सूर्योदय आधारित) की हैं और कुछ क्षेत्रों में एक दिन का अंतर हो सकता है।
अष्टमी या नवमी को छोटी कन्याओं की माँ दुर्गा के जीवंत स्वरूप के रूप में पूजा होती है। इसे नवरात्रि व्रत की पूर्णता माना जाता है।
| आयु | रूप | पूजन का फल |
| 2 वर्ष | कुमारिका | दुःख-दरिद्रता का नाश |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति | धन-धान्य और सुखी परिवार |
| 4 वर्ष | कल्याणी | कल्याण; विद्या और कार्य में सफलता |
| 5 वर्ष | रोहिणी | रोगों से मुक्ति |
| 6 वर्ष | कालिका | विजय और विद्या |
| 7 वर्ष | चंडिका | ऐश्वर्य और धन |
| 8 वर्ष | शाम्भवी | यश, और विवाद में विजय |
| 9 वर्ष | दुर्गा | शत्रुओं का नाश; कठिन कार्यों में सफलता |
| 10 वर्ष | सुभद्रा | सभी मनोकामनाएँ पूर्ण |
कन्याओं (और लांगुर) को एक दिन पहले आदर से निमंत्रण दें — परंपरा से उनके घर जाकर। उस दिन उन्हें द्वार पर मुस्कान के साथ स्वागत करें।
उन्हें आसन पर बैठाएँ, सबका मुख पूर्व या उत्तर की ओर; लांगुर उनके साथ, प्रायः एक किनारे बैठता है।
हर बच्चे के पैर थाली में साफ़ जल से धोएँ, तौलिए से पोंछें और श्रद्धा से पैर छुएँ — यही इस पूजा का सार है: कन्या को साक्षात् देवी मानकर पूजा जाता है।
हर माथे पर अक्षत सहित रोली का तिलक लगाएँ, दाईं कलाई पर मौली बाँधें, फूल या माला पहनाएँ, और हर कन्या को लाल चुनरी ओढ़ाएँ। लांगुर को भी तिलक और मौली।
हाथ जोड़कर नीचे दिए मंत्र से कन्याओं में देवी का आवाहन करें; फिर हर एक को फूल अर्पित करें, और दीपक से सबकी एक साथ छोटी आरती करें।
हलवा, पूरी और चने प्रेम से परोसें; लांगुर को भी। उन्हें जितना चाहें खाने दें — जल्दी न करें। परिवार कन्याओं के भोजन के बाद ही भोजन करता है।
हर बच्चे के हाथ में उपहार या दक्षिणा दें, साथ में घर ले जाने के लिए थोड़ा प्रसाद।
उनके पैर छुएँ, आशीर्वाद माँगें, और जिस आदर से स्वागत किया था उसी आदर से द्वार तक विदा करें।
यह आम घरेलू परंपरा है; दिन (अष्टमी / नवमी), कन्याओं की संख्या और प्रसाद क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग होते हैं। आयु-अनुसार नाम पंचांगों में मिलने वाली शास्त्रीय कुमारी सूची है।
यह आम तौर पर प्रयुक्त सूची है; सामग्री क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है — जहाँ अंतर हो, अपनी परंपरा या पंडित जी की सलाह मानें।