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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा पूजा

ॐ दुं दुर्गायै नमः

माँ दुर्गा की पूजा और नवरात्रि के लिए ज़रूरी सारा सामान एक सूची में। जैसे-जैसे सामान जुटाएँ, टिक करते जाएँ — आपकी सूची इसी डिवाइस पर सहेजी रहती है।

पूजा से पहले

  • स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें — देवी पूजा में लाल या पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।
  • पूजा का स्थान साफ़ करें। चौकी ऐसे रखें कि आप पूर्व (या उत्तर) की ओर मुख करके बैठें।
  • चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ और उस पर माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर रखें।
  • शुरू करने से पहले सारी सामग्री पास रख लें, ताकि बीच में उठना न पड़े।
  • शांत मन से अपने आसन पर बैठें; पास में शुद्ध जल का लोटा और चम्मच (आचमनी) रखें।

पूजा विधि — क्रम से

  1. 1पवित्रीकरण

    बाएँ हाथ में थोड़ा जल लें, दाएँ हाथ से फूल या कुश उसमें डुबोकर अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर छिड़कें, और यह मंत्र बोलें:

    मंत्र
    ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
    यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
  2. 2आचमन

    दाएँ हाथ की हथेली से तीन बार जल पिएँ, हर बार एक नाम के साथ, फिर चौथे नाम से हाथ धो लें:

    मंत्र
    ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।
    ॐ हृषीकेशाय नमः (हाथ धोएँ)
  3. 3आसन शुद्धि

    अपने आसन पर जल की कुछ बूँदें छिड़कें और पृथ्वी माता से प्रार्थना करें:

    मंत्र
    ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
    त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
  4. 4दीप प्रज्वलन

    माँ के दाईं ओर घी का दीपक जलाएँ (नवरात्रि में अखंड ज्योति रखते हों तो वही), और उस पर एक फूल चढ़ाएँ:

    मंत्र
    शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदः।
    शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
  5. 5संकल्प

    दाएँ हाथ में जल, अक्षत, फूल और सिक्का लें। तिथि, स्थान, अपना नाम और गोत्र, और पूजा का उद्देश्य बोलें (अपने शब्दों में भी बोल सकते हैं), फिर जल माँ के सामने छोड़ दें।

    खाली जगहों पर मास, पक्ष, तिथि, अपना गोत्र और नाम बोलें (आज का पंचांग इसी साइट पर देखें)।

    मंत्र
    ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। अद्य ...... मासे ...... पक्षे ...... तिथौ
    ...... गोत्रोत्पन्नः ...... नामाहं
    श्रीदुर्गादेव्याः प्रीत्यर्थं यथाशक्ति पूजनं करिष्ये॥
  6. 6गणेश पूजन

    हर पूजा श्री गणेश से शुरू होती है। गणेश जी (मूर्ति, तस्वीर, या मौली बँधी सुपारी उनके प्रतीक के रूप में) को रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएँ:

    मंत्र
    वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
    निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
    ॐ गं गणपतये नमः।
  7. 7कलश स्थापना (घटस्थापना)

    नवरात्रि में यह पहले दिन (प्रतिपदा) शुभ मुहूर्त में होता है — पंचांग देखें।

    मिट्टी के चौड़े पात्र में मिट्टी बिछाएँ, उसमें जौ बोएँ और जल छिड़कें।

    कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और गले में मौली बाँधें। उसमें जल और थोड़ा गंगाजल भरें; सिक्का, सुपारी, अक्षत और दूर्वा डालें।

    कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते लगाएँ, चावल भरा ढक्कन रखें, और उस पर लाल कपड़े में लिपटा (मौली बँधा) नारियल रखें। कलश को जौ वाले पात्र पर या माँ के पास स्थापित करें।

    कलश पर रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ और वरुण देव का आवाहन करें:

    मंत्र
    कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
    मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
    ॐ वरुणाय नमः।
  8. 8ध्यान

    हाथ जोड़ें, आँखें बंद करें, और माँ दुर्गा के स्वरूप का ध्यान करें — सिंह पर विराजमान, अस्त्र धारण किए, भक्तों को आशीर्वाद देती हुई:

    मंत्र
    सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
  9. 9आवाहन

    जुड़े हाथों में अक्षत और फूल लेकर माँ को मूर्ति/तस्वीर में पधारने का निमंत्रण दें, और उनके चरणों में अर्पित करें:

    मंत्र
    ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि।
  10. 10षोडशोपचार पूजन

    नीचे की हर वस्तु क्रम से चढ़ाएँ, और हर बार "ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः, [उपचार] समर्पयामि" बोलें:

    आसन (आसन के रूप में फूल) → पाद्य (चरणों में जल) → अर्घ्य (रोली, अक्षत, फूल मिला जल) → आचमन (जल) → स्नान (पंचामृत, फिर शुद्ध जल; तस्वीर हो तो फूल से छींटें दें)

    वस्त्र (लाल चुनरी) → श्रृंगार (चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, आलता, कंघी, शीशा…) → गंध (चंदन और रोली, फिर सिंदूर) → अक्षत → पुष्प और माला (लाल फूल)

    धूप → दीप → नैवेद्य (भोग — फल, मिठाई; फिर जल अर्पित करें) → ताम्बूल (पान पर सुपारी, लौंग, इलायची) → दक्षिणा (सिक्का) → प्रदक्षिणा और नमस्कार

    मंत्र
    ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः, [उपचार] समर्पयामि।
    (उदाहरण: ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः, पुष्पं समर्पयामि।)
  11. 11पाठ और जाप

    श्रद्धा से दुर्गा सप्तशती का पाठ करें (समय कम हो तो दुर्गा चालीसा या अर्गला-कवच-कीलक)।

    माला पर माँ का मंत्र जपें — एक माला 108 बार। कई घरों में नीचे दिया छोटा मंत्र जपा जाता है; नवार्ण मंत्र परंपरा से गुरु से लिया जाता है।

    मंत्र
    ॐ दुं दुर्गायै नमः॥
  12. 12आरती

    घी के दीपक या कपूर से माँ की आरती करें — विधि "आरती" टैब में देखें।

  13. 13पुष्पांजलि और प्रदक्षिणा

    जुड़े हाथों में फूल लेकर माँ को अर्पित करें, और पूजा स्थान की परिक्रमा करें (या अपनी जगह पर ही घूमकर) हाथ जोड़े रहें:

    मंत्र
    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
  14. 14क्षमा प्रार्थना

    हाथ जोड़कर माँ से पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें:

    मंत्र
    आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
    पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
    मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
    यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
  15. 15प्रसाद वितरण

    भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें, फिर स्वयं ग्रहण करें।

नवरात्रि विशेष

अखंड ज्योति: घटस्थापना पर अखंड ज्योति जलाएँ तो उसे नौ दिन लगातार जलने दें — घी डालते रहें और बत्ती सावधानी से ठीक करें, और ज्योति जलती छोड़कर घर खाली न छोड़ें।

रोज़ की पूजा: कलश स्थापना एक बार, प्रतिपदा को होती है। अगले दिनों में बाक़ी विधि (ध्यान से आगे) सुबह-शाम करें, और रोज़ जौ में थोड़ा जल डालें।

कन्या पूजन (अष्टमी / नवमी): नौ छोटी कन्याओं (प्रायः 2–10 वर्ष) को और परंपरा के अनुसार एक बालक को लांगुर/भैरव के रूप में आमंत्रित करें। उनके पैर धोएँ, तिलक लगाएँ, मौली बाँधें, हलवा-पूरी-चना खिलाएँ, उपहार या दक्षिणा दें, और पैर छूकर आशीर्वाद लें।

विसर्जन (दशमी): अंतिम पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना के साथ माँ से विदा लें, कलश को आदर से हटाएँ, और जवारे बहते जल में विसर्जित करें या सम्मान से रखें — कई लोग कुछ जवारे आशीर्वाद के रूप में रख लेते हैं।

यह आम घरेलू पूजा विधि है। क्रम और कुछ मंत्र क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं; मंत्र पारंपरिक रूप में दिए गए हैं, और इन्हें एक बार किसी विश्वसनीय पुस्तक (जैसे गीता प्रेस) या अपने पारिवारिक पंडित जी से मिला लेना अच्छा है। सच्चे मन से की गई पूजा हर चरण के बिना भी पूर्ण मानी जाती है।

आरती कैसे करें

  1. आरती की थाली सजाएँ: घी का दीपक (या कपूर), रोली, अक्षत, फूल और छोटी घंटी।
  2. माँ के सामने खड़े हों। बाएँ हाथ से घंटी बजाएँ और दाएँ हाथ से थाली को घड़ी की दिशा में घुमाते हुए आरती गाएँ।
  3. प्रचलित तरीक़ा: चार बार माँ के चरणों में, दो बार नाभि के पास, एक बार मुख के सामने, फिर सात बार पूरे स्वरूप पर।
  4. आरती के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाएँ, फिर सबको आरती दें — सब दोनों हाथ लौ के ऊपर घुमाकर आँखों और सिर से लगाएँ।

आरती — जय अम्बे गौरी

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग कृपाण धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥

शुम्भ निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥

चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥

चौंसठ योगिनी मंगल, गावत नृत्य करत।
भैरव तुम अंग राखत, तव आज्ञा करत॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरतारी।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपत्ति कारी॥

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥

नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) की, हर दिन एक रूप की, पूजा होती है। हर दिन का अपना स्वरूप, मंत्र, भोग और — लोकप्रिय परंपरा के अनुसार — पहनने का रंग है।

इस साल की नवरात्रि की तारीखें देखी जा रही हैं…
  1. 1शैलपुत्री — पर्वतराज हिमालय की पुत्री
    आज का रंग: नारंगी

    स्वरूप: वृषभ (नंदी) पर सवार; दाएँ हाथ में त्रिशूल, बाएँ में कमल। मस्तक पर अर्धचंद्र।

    मंत्र
    वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
    वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

    भोग: शुद्ध घी (या घी से बना पदार्थ) · फल: आरोग्य, बल और स्थिरता; मूलाधार चक्र

  2. 2ब्रह्मचारिणी — तप का आचरण करने वाली
    आज का रंग: सफ़ेद

    स्वरूप: पैदल चलती हुईं; दाएँ हाथ में जप माला, बाएँ में कमंडल। श्वेत वस्त्र।

    मंत्र
    दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
    देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

    भोग: शक्कर और फल (या पंचामृत) · फल: भक्ति, धैर्य और साधना-विद्या में सफलता; दीर्घायु

  3. 3चंद्रघंटा — मस्तक पर घंटे के आकार का चंद्र
    आज का रंग: लाल

    स्वरूप: सिंह पर सवार; दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र, युद्ध के लिए तत्पर; स्वर्ण वर्ण; मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र।

    मंत्र
    पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
    प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

    भोग: दूध और दूध से बनी मिठाई (खीर) · फल: साहस और निर्भयता; घर में शांति

  4. 4कूष्मांडा — अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली
    आज का रंग: गहरा नीला

    स्वरूप: सिंह पर सवार; आठ भुजाओं (अष्टभुजा) में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला।

    मंत्र
    सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
    दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

    भोग: मालपुआ · फल: आरोग्य, यश और समृद्धि; दुःख का नाश

  5. 5स्कंदमाता — स्कंद (कार्तिकेय) की माता
    आज का रंग: पीला

    स्वरूप: कमल पर विराजमान, गोद में बालक स्कंद; चार भुजाएँ — दो में कमल, एक में स्कंद, एक वरद मुद्रा में।

    मंत्र
    सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चितकरद्वया।
    शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

    भोग: केला · फल: संतान और परिवार का सुख; ज्ञान

  6. 6कात्यायनी — महर्षि कात्यायन की पुत्री रूप में अवतरित
    आज का रंग: हरा

    स्वरूप: सिंह पर सवार; चार भुजाएँ — बाएँ हाथों में खड्ग और कमल, दाएँ हाथ वर और अभय मुद्रा में।

    मंत्र
    चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
    कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

    भोग: शहद · फल: विवाह और उत्तम जीवनसाथी; बाधाओं का नाश

  7. 7कालरात्रि — अंधकार और बुराई का नाश करने वाली रात्रि
    आज का रंग: स्लेटी

    स्वरूप: गर्दभ (गधे) पर सवार; श्याम वर्ण, बिखरे केश, अग्निमय श्वास; बाएँ हाथों में खड्ग और लौह कांटा, दाएँ हाथ वर और अभय मुद्रा में। रूप भयंकर, पर भक्तों के लिए सदा शुभ — इसलिए "शुभंकरी" भी।

    मंत्र
    एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
    लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

    भोग: गुड़ · फल: भय, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा

  8. 8महागौरी — अत्यंत गौर वर्ण वाली
    आज का रंग: बैंगनी

    स्वरूप: वृषभ पर सवार; गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र और आभूषण; चार भुजाएँ — त्रिशूल और डमरू, शेष हाथ वर और अभय मुद्रा में।

    मंत्र
    श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
    महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

    भोग: नारियल · फल: पवित्रता, शांति और मनोकामना पूर्ति; इसी दिन (अष्टमी) प्रायः कन्या पूजन होता है

  9. 9सिद्धिदात्री — सभी सिद्धियाँ देने वाली
    आज का रंग: मोरपंखी हरा

    स्वरूप: कमल पर विराजमान (सिंह पर भी दर्शाई जाती हैं); चार भुजाओं में चक्र, गदा, शंख और कमल। देव, ऋषि और सिद्ध सभी इनकी उपासना करते हैं।

    मंत्र
    सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
    सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

    भोग: तिल और हलवा-पूरी-चना · फल: सभी सिद्धियाँ, ज्ञान और व्रत की पूर्णता; नवमी को कन्या पूजन

नौ रूप, उनके मंत्र (देवी कवच से) और भोग पारंपरिक हैं। दिन का रंग आधुनिक परंपरा है जो वार के अनुसार चलती है: यह सूची प्रचलित पंचांग तालिकाओं से मिलती है। तारीखें नई दिल्ली (सूर्योदय आधारित) की हैं और कुछ क्षेत्रों में एक दिन का अंतर हो सकता है।

कन्या पूजन (कुमारी पूजा)

अष्टमी या नवमी को छोटी कन्याओं की माँ दुर्गा के जीवंत स्वरूप के रूप में पूजा होती है। इसे नवरात्रि व्रत की पूर्णता माना जाता है।

कब और कितनी कन्याएँ

  • कन्या पूजन नवरात्रि (चैत्र और शारदीय दोनों) की महाष्टमी या महानवमी को किया जाता है। उत्तर भारत के अधिकांश घरों में अष्टमी को; कई परिवार नवमी को करते हैं — अपनी पारिवारिक परंपरा मानें।
  • यह सुबह की पूजा और हवन (यदि हो) के बाद किया जाता है, और परंपरा से इसके बाद ही नवरात्रि का व्रत खोला जाता है।
  • परंपरा से नौ कन्याएँ (देवी के नौ रूप) और एक बालक, जिसकी पूजा लांगुर / बटुक भैरव — देवी के रक्षक — के रूप में होती है। नौ न मिलें तो दो कन्याएँ भी पर्याप्त मानी जाती हैं — कम से कम एक।
  • आयु 2 से 10 वर्ष। 2 से कम आयु की कन्या पूजन के लिए बहुत छोटी मानी जाती है; 10 से ऊपर कुमारी रूप पूर्ण माना जाता है।

आयु के अनुसार कुमारी के रूप

आयुरूपपूजन का फल
2 वर्षकुमारिकादुःख-दरिद्रता का नाश
3 वर्षत्रिमूर्तिधन-धान्य और सुखी परिवार
4 वर्षकल्याणीकल्याण; विद्या और कार्य में सफलता
5 वर्षरोहिणीरोगों से मुक्ति
6 वर्षकालिकाविजय और विद्या
7 वर्षचंडिकाऐश्वर्य और धन
8 वर्षशाम्भवीयश, और विवाद में विजय
9 वर्षदुर्गाशत्रुओं का नाश; कठिन कार्यों में सफलता
10 वर्षसुभद्रासभी मनोकामनाएँ पूर्ण

कन्या पूजन की सामग्री

  • कन्याओं और लांगुर के लिए साफ़ आसन
  • पैर धोने के लिए साफ़ जल की थाली / परात और तौलिया
  • रोली, अक्षत, मौली (कलावा)
  • हर कन्या के लिए लाल चुनरी (लांगुर के लिए छोटा लाल वस्त्र)
  • फूल और छोटी माला
  • प्रसाद: हलवा, पूरी और काले चने; कुछ परिवारों में खीर या फल
  • हर बच्चे के लिए थाली और पानी का गिलास
  • उपहार या दक्षिणा: सिक्का, चूड़ियाँ, हेयर क्लिप, मिठाई, पेन या कॉपी आदि
  • दीपक और आरती की थाली

विधि — क्रम से

  1. 1एक दिन पहले निमंत्रण

    कन्याओं (और लांगुर) को एक दिन पहले आदर से निमंत्रण दें — परंपरा से उनके घर जाकर। उस दिन उन्हें द्वार पर मुस्कान के साथ स्वागत करें।

  2. 2स्वागत और आसन

    उन्हें आसन पर बैठाएँ, सबका मुख पूर्व या उत्तर की ओर; लांगुर उनके साथ, प्रायः एक किनारे बैठता है।

  3. 3पाद प्रक्षालन

    हर बच्चे के पैर थाली में साफ़ जल से धोएँ, तौलिए से पोंछें और श्रद्धा से पैर छुएँ — यही इस पूजा का सार है: कन्या को साक्षात् देवी मानकर पूजा जाता है।

  4. 4तिलक, मौली और चुनरी

    हर माथे पर अक्षत सहित रोली का तिलक लगाएँ, दाईं कलाई पर मौली बाँधें, फूल या माला पहनाएँ, और हर कन्या को लाल चुनरी ओढ़ाएँ। लांगुर को भी तिलक और मौली।

  5. 5आवाहन और पूजन

    हाथ जोड़कर नीचे दिए मंत्र से कन्याओं में देवी का आवाहन करें; फिर हर एक को फूल अर्पित करें, और दीपक से सबकी एक साथ छोटी आरती करें।

  6. 6भोजन

    हलवा, पूरी और चने प्रेम से परोसें; लांगुर को भी। उन्हें जितना चाहें खाने दें — जल्दी न करें। परिवार कन्याओं के भोजन के बाद ही भोजन करता है।

  7. 7दक्षिणा और उपहार

    हर बच्चे के हाथ में उपहार या दक्षिणा दें, साथ में घर ले जाने के लिए थोड़ा प्रसाद।

  8. 8आशीर्वाद और विदाई

    उनके पैर छुएँ, आशीर्वाद माँगें, और जिस आदर से स्वागत किया था उसी आदर से द्वार तक विदा करें।

मंत्र

कन्या आवाहन
मन्त्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।
नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्॥
कन्याओं को नमस्कार
ॐ कुमार्यै नमः। ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः।
लांगुर (बटुक भैरव) को नमस्कार
ॐ बटुकाय नमः।

ध्यान रखें

  • बच्चों को सम्मानित अतिथि मानें, निपटाने वाली रस्म नहीं — सही मंत्र से ज़्यादा धैर्य और स्नेह का महत्व है।
  • भोजन ताज़ा, सात्विक और कम मसाले वाला रखें; किसी एलर्जी के बारे में माता-पिता से पूछ लें।
  • किसी खास आयु की कन्या न मिले तो 2 से 10 के बीच कोई भी आयु ठीक है — संख्या और श्रद्धा महत्वपूर्ण हैं, सटीक आयु नहीं।
  • उन्हें खाली हाथ विदा न करें, और उनके भोजन से पहले कोई और भोजन न करे।

यह आम घरेलू परंपरा है; दिन (अष्टमी / नवमी), कन्याओं की संख्या और प्रसाद क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग होते हैं। आयु-अनुसार नाम पंचांगों में मिलने वाली शास्त्रीय कुमारी सूची है।

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पूजा सामग्री सूची

मूर्ति व आसन (0/5)

कलश स्थापना (0/9)

जौ बोना (जवारे) (0/3)

पूजा की सामग्री (0/20)

फूल व माला (0/3)

माँ का श्रृंगार (0/11)

भोग व प्रसाद (0/6)

अन्य (0/5)

यह आम तौर पर प्रयुक्त सूची है; सामग्री क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है — जहाँ अंतर हो, अपनी परंपरा या पंडित जी की सलाह मानें।